भयानक जंगलो की खतरनाक कहानियां

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ये कहानिया भेजी है US के एक retired सर्च एंड रेस्क्यू (search and rescue) officer ने. जिस तरह हमारे यहाँ आपातकाल पुलिस होती है. उसी तरह America में एक अलग पुलिस डिपार्टमेंट होता है जिनका काम जंगलो और पहाड़ो पर खोये हुए लोगो को ढूंढ़ने का होता है.
नीचे बताई गयी कहानिया बिलकुल सच्ची है, और अफसर के साथ घटित हो चुकी हैं,

Search and Rescue Horror Stories in Hindi

 

अपनी 35 साल की नौकरी में खोये हुए लोगो को ढूंढ़ने का मेरा बहुत अच्छा रिकॉर्ड रहा है. ज्यादातर लोग या तो अपने रास्ते से भटक जाते हैं या फिर किसी पहाड़ी से फिसल कर रास्ता भूल जाते है और वापिस नहीं जा पाते. जैसा की पुरानी कहावत है की – अगर खो जाओ तो जहाँ हो वहीँ रहो – इसलिए ज्यादातर लोग जो जंगलो और पहाड़ो पर खो जाते हैं वो वही आस पास ही मिल जाते हैं और कहीं दूर नहीं जाते. लेकिन दो बार मेरे पास ऐसे केस आये जहाँ ऐसा नहीं हुआ. इन दोनों ही cases ने मुझको अंदर तक हिला के रख दिया था. और इन्ही केसेस ने मुझे आगे motivation दी की मैं पूरी शिद्दत के साथ खोये हुए लोगो को ढूँढू जिन लोगो को ढूंढ़ने का जिम्मा मुझे दिया गया है.

पहला केस था एक छोटे से लड़के का जो अपने अपने माँ बाप के साथ जंगल में पिकनिक मनाने गया था. वो बच्चा और उसकी छोटी बहन दोनों एक ही साथ खोये थे. दोनों बच्चे माँ बाप के साथ ही खेल रही थे, की माँ बाप की नजर सिर्फ कुछ सेकण्ड्स के लिए ही उनसे हटी और दोनों बच्चे अचानक गायब हो गए. माँ बाप के काफी ढूंढ़ने पर भी जब बच्चे नहीं मिले तब उन्होंने हमें फ़ोन किया. मैं अपनी टीम के साथ उस जगह पंहुचा जहाँ से बच्चे गायब हुए थे. थोड़ा सा ढूंढ़ने पर बच्ची तो बहुत जल्दी मिल गयी. पर वो छोटा लड़का नहीं मिला. जब बच्ची से हमने उसके भाई के बारे में पूछा तो उसने बताया की भैया को “भालू अंकल” ले कर गए हैं. उसने बताया की “भालू अंकल” ने उसको खाने के लिए बेर दिए और उसको किसी को कुछ न बताने के लिए बोला. “वो बस भैय्या के साथ थोड़ी देर खेलना चाहता था”, बच्ची ने बताया. आखरी बार बच्ची ने अपने भाई को देखा था तब वो “भालू अंकल” के कंधो पर बैठा हुआ था और खुश था. जाहिर था की हमारा सबसे पहला शक गया की शायद ये किडनेपिंग का केस है. और बच्चे को किसी ने बेहला फुसला के किडनैप कर लिया है. लेकिन उस एरिया को अच्छे से छानने के बाद भी हमें किसी दूसरे आदमी के वहां आने का कोई सुराग नहीं मिला. लड़की बार बार यही बता रही थी की वो “भालू अंकल” दिखने में बिलकुल अलग था, उसका कद बहुत लम्बा था और उसके शरीर पर बहुत बाल थे, जैसे की भालू के होते हैं, और उसका चेहरा बहुत अजीब सा था. अजीब सा. बच्ची ने यही बताया. हमने उस इलाके को कई हफ्तों तक छाना लेकिन बच्चे का कोई सुराग नहीं मिला. वो मेरी लाइफ के सबसे लम्बे चले cases में से एक था. आखिर में हार कर हमें वो केस बंद ही करना पड़ा.

दूसरा केस था एक 11-12 साल की लड़की का जो अपनी मम्मी और दादा जी के साथ पहाड़ो पर घूमने के लिए गयी थी. उसकी मम्मी ने बताया की वो बस एक मिनट के लिए एक पेड़ पर चढ़ी थी ये देखने के लिए की आस पास और क्या क्या है. बस फिर वो लड़की उस पेड़ से कभी नीचे नहीं आयी. पता नहीं पेड़ से ही कहाँ गायब हो गयी. उन्होंने उसका घंटो तक पेड़ के नीचे वेट किया. ना कोई चिल्लाने की आवाज़ आयी ना ही गिरने की. लड़की पेड़ के ऊपर से ही ऐसे गायब हो गयी जैसे की हवा में गायब हो गयी हो. घंटो वेट करने के बाद उन्होंने हमसे कांटेक्ट किया. जब हम वहां पहुंचे तो हमने भी उस इलाके को अच्छे से ढूंढा, लेकिन लड़की का कहीं कोई अता पता नहीं मिला.

मैं आज तक नहीं समझ पाया की वो दोनों बच्चे कहाँ गायब हुए, और उन मासूमो का ढूंढ ना पाने का दर्द मैं आज भी महसूस करता हूँ.

कई बार जब किसी खोये हुए शख्स को ढूंढ़ने जाना होता था तो मैं अकेला ही अपने खोजी कुत्तो को साथ लेके निकल पड़ता था. और अकसर वो खोजी कुत्ते मुझे सीधा किसी ऊँची पहाड़ी के नीचे ले जाते. कोई छोटी मोटी पहाड़ी नहीं, बल्कि ऊँची ऊँची पहाड़ियां. जहाँ ना कोई पेड़, ना कोई चट्टान, ना ही कोई पत्थर, सिर्फ सीधी खड़ी ऊँची पहाड़ियां. जिनपर चढ़ना किसी आम इंसान तो छोड़ो, किसी professional के बस का भी नहीं था. ऐसी पहाड़िया जहाँ ठीक से हाथ रखने तक की जगह नहीं होती थी. और हमेशा ही खोया हुआ इंसान पहाड़ के ऊपर या फिर दूसरी तरफ ही मिलता था, वो भी हीलीकाप्टर की मदद से कई कई किलोमीटर दूर . उन लोगो को याद ही नहीं होता था की वो वहां कैसे पहुंचे. दिमाग घूम जाता था ये सोचके की वो उस तरफ कैसे पहुंच जाते थे. कोई ना कोई जवाब तो जरूर ही होगा इसका, लेकिन मुझे इसका आज तक कोई जवाब नहीं मिला.

एक केस मुझे अच्छे से याद है जिसमे हमें एक डेड-बॉडी मिली थी. एक 11 साल की लड़की एक नदी पार कर रही थी उसपे बने एक छोटे से पुल से. अचानक उसका पैर फिसला और वो निचे एक पत्थर पर जा गिरी. लड़की सर के बल गिरी थी और गिरते ही उसकी मौत हो गयी थी. ऐसा नहीं था की मैंने पहली बार कोई डेड बॉडी देखी हो, लेकिन उस लड़की की माँ को जब उसके मौत की खबर मिली तो उसकी माँ की वो दिल दहला देने वाली चीखे मैं कभी नहीं भूल सकता. लड़की की बॉडी को जब हम एम्बुलेंस में डाल रही थे तब उसकी लाश को देखके उसकी माँ की वो दिमाग को फाड़ कर रख देने वाली चीखे बहुत डरावनी थी. ऐसा लगा मनो उसकी बेटी के साथ ही उसका सब कुछ ख़तम हो गया हो. उसकी चीख में जो दर्द था, ऐसा लगा मानो उसकी बेटी के साथ उसकी भी मौत हो गयी हो. कुछ दिनों बाद मेरे ही एक साथी ने बताया की उस माँ ने खुद कुशी कर ली है. वो अपनी बेटी के बिना नहीं रह सकती थी. काश मैं उसके लिए कुछ कर पता.

एक बार मुझे एक दूसरी टीम के अफसर के साथ काम करने का मौका मिला, मैं खुद भी एक officer ही था. हुआ यूँ था की हमें एक इलाके में कुछ भालुओं के होने की रिपोर्ट मिली थी, उसी रिपोर्ट के सिलसिले में हम वहां जांच करने गए थे. दरअसल उसी दौरान उस इलाके में एक आदमी के खो जाने की भी रिपोर्ट मिली थी. वह आदमी पहाड़ी चढ़ने(hiking) के लिए गया था और उसको कुछ दिन में वापिस आ जाना था, लेकिन वो वापिस आया नहीं.
ट्रेनिंग के दौरान हमें पहाड़ चढ़ना सिखाया जाता है. और उस आदमी को ढूंढ़ने के लिए हमें बहुत मुश्किल मुश्किल पहाड़िया चढ़नी पड़ी. आखरी में हमें वो मिल ही गया. उसका पैर दो पत्थरो के बीच बने छोटे से छेद में फंस गया था और टूट गया था. मालूम पड़ा की वो वहां दो दिन से फंसा हुआ था और उसका पैर सड़ना शुरू हो चुका था. काफी देर मशक्कत करने के बाद किसी तरह हमने उसको बाहर निकला और हेलीकाप्टर पर चढ़ाया. हेलीकाप्टर में सिर्फ डॉक्टर ही था उसके साथ . बाद में उस डॉक्टर ने हमको बताया की वो आदमी चुप ही नहीं हो रहा था और रोये जा रहा था. बार बार एक ही बात बोले जा रहा था की वो तो बिलकुल ठीक था, और अच्छे से पहाड़ी की चढाई कर रहा था की उसको वहां एक रहस्यमयी आदमी मिला. उस आदमी के पास चढाई का कोई औजार नहीं था और वो सफ़ेद कपडे पहने हुए था. वो उस रहस्यमयी आदमी के पास गया और उसको पीछे से आवाज़ दी, वो आदमी पलटा तो उसने देखा की उसका कोई चेहरा ही नहीं है. सिर था लेकिन कोई आँख, नाक, मुँह कुछ नहीं था. उसने बताया की उस आदमी को देख के वो इतना डर गया की जल्दी से पहाड़ी के नीचे आने लगा और उसी दौरान उसका पैर फिसला और वो वहां फंस गया. उसने बताया की जब वो वहां फंसा हुआ था तो पूरी रात उस बिना मुँह के आदमी के नीचे उतरने की आवाज़ें सुनता रहा था, नीचे उतरते हुए उस आदमी  की भयानक दिल दहला देने वाली चीखे पूरी रात उसने सुनी. डॉक्टर की ये बात सुन के मेरा रोग रोग खड़ा हो गया था. अच्छा हुआ जब वो ये कहानी सुना रहा था मैं उस के साथ हीलीकाप्टर में नहीं था .

मेरी जिंदगी की सबसे भयानक cases में से था एक था, एक लड़की का ढूंढ़ने का केस, जो की अपने दोस्तों के ग्रुप के साथ पहाड़ चढ़ने (hiking) के लिए गयी थी और उनसे अलग हो गयी . उस दिन हम देर तक बाहर पहाड़ी पर ही उसको ढूंढ रहे थे क्योकि हमारे खोजी कुत्तो को उसकी गंध मिल गयी थी. आखिरकार वो हमें मिली. जब वो हमें मिली तब वो एक बड़े सड़े लक्कड़ के अंदर सहमी हुई बैठी थी. उसको देखने से ही पता चल रहा था की वो सदमे में थी और बहुत ज्यादा डरी हुई थी. उसके एक पैर का जूता भी गायब था और उसका बैग भी वहां नहीं था. हालांकि उसको कोई चोट नहीं लगी थी, इसलिए हम उसको अपने साथ पैदल ही वापिस ले जाने लगे अपने बेस पर. अँधेरा हो चुका था. वापिस जाते समय वो लड़की बार बार पीछे मुड़ मुड़ के देख रही थी और बार बार पूछ रही थी की वो बड़ी बड़ी काली आँखों वाला आदमी हमारा पीछा क्यों कर रहा है. हमें वहां कोई आदमी नहीं दिखा, लेकिन वो बार बार पीछे देख रही थी. हमें लगा शायद वो सदमे के कारन ऐसी बहकी बहकी बाते कर रही है. लेकिन हम जैसे जैसे अपने बेस के पास पहुंच रहे थे, उसकी अजीब हरकतें बढ़ती जा रही थी और उसने चिल्लाना शुरू कर दिया था. बार बार वो मुझसे कह रही थी – “उस आदमी को बोल दो मुझे देख के मूह ना बनाये”. एक मौका तो ऐसा आया, की वो लड़की वही रुक गयी और पलट के चिल्लाने लगी – “मेरा पीछा करना बंद करो, मेरा पीछा करना बंद करो. मैं तुम्हारे साथ नहीं जाउंगी, मैं तुम्हे इन लोगो को भी तुम्हारे साथ नहीं ले जाने दुंगी. ”
बड़ी मुश्किल से हम उसको खींच के आगे बढ़े, लेकिन उसके अचानक बाद हमें अपने चारो तरफ से अजीब अजीब सी आवाज़ें आने लगी. अँधेरे होने के कारन कुछ दिख तो नहीं रहा था लेकिन आवाज़ें चारो तरफ से आ रही थी. ऐसा लग रहा था मनो कोई खांस रहा हो. लेकिन वो कोई नार्मल खांसी नहीं थी, कोई बनावटी खांसी लग रही थी, एक लय में आ रही थी, वो भी चारो तरफ से. जैसे रात के अँधेरे में कीड़े आवाज़ करते है ना, बिलकुल ऐसे. मुझे नहीं पता मैं उस आवाज़ को कैसे बयान करू.
जब हम अपने बेस पर बस पहुंचने ही वाले थे, वो लड़की रुकी और उसने मेरी तरफ देखा. उसकी आँखें इतनी ज्यादा फटी हुई थी जितना कोई इंसान नोर्मली नहीं खोल सकता.
उसने मेरे कंधे पर हाथ रखा और धीरे से बोली– ” वो कह रहा है की तुम जल्दी से यहाँ से निकल जाओ, उसको तुम्हारी गर्दन पर बना चोट का निशान बिलकुल अच्छा नहीं लग रहा है.”
मेरी गर्दन पर बचपन में लगी एक चोट का निशान है जो की कपडे पहनने के बाद नहीं दिखता. और उस टाइम तो मैंने जैकेट भी पहनी हुई थी, मुझे नहीं पता उस लड़की को उस निशान के बारे में कैसे पता चला. लेकिन जैसे ही उसने मुझको ये बोला, अचानक वो खांसने की आवाज़ बिलकुल मेरे कान के अंदर से ही आने लगी. मेरे रोग रोग खड़ा हो गया, और दिल धाड़ धाड़ बजने लगा. मेरे साथ मेरे और साथी भी थे, मैंने उनको बोला जल्दी से निकलो यहाँ से, मैं बहादुर दिखने की कोशिश कर रहा था अपने साथियो के सामने , लेकिन सच ये है के मैं उस समय हद से ज्यादा डर गया था. आखिर हम अपने बेस पहुंच गए, लेकिन उस रात जो हुआ उसको सोच के मैं आज भी काँप उठता हूँ.

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HAUNTED STORIES IN HINDI

ये अगली कहानी मेरी सारी कहानियो में सबसे अजीब है. अब मुझे ये तो नहीं पता की सभी टीम्स के साथ ऐसा हुआ है या नहीं, लेकिन जहाँ तक मेरी यूनिट का सवाल है, तो ये बहुत आम सी बात थी हमारी यूनिट के लिए, हालाँकि इसके बारे में कभी आपस में बात नहीं करी जाती थी. आप लोग चाहो तो किसी दूसरे खोजी दस्ते (search and rescue team) के officers से इसके बारे में पूछ सकते हैं. हो सकता है उनको इस बारे में पता भी हो लेकिन पूरे chances हैं की वो आपको बताएँगे नहीं इसके बारे में. हमारे सीनियर ऑफिसर्स की तरफ से हमको सख्त निर्देश होता था की किसी भी हालत में इस बारे में कोई बात नहीं होगी, चाहे कुछ भी हो जाये. शुरू शुरू में मुझे भी अजीब लगा था लेकिन थोड़े ही टाइम बाद मुझे भी इनकी आदत पड़ गयी थी और तकरीबन हर दूसरे तीसरे दिन ही इनसे सामना हो जाता था. होता यूँ था की तकरीबन हर एक केस में ही, जब हमें किसी को ढूंढ़ने के लिए जंगल में कई किलोमीटर अंदर तक जाना पड़ता था, कई किलोमीटर मतलब 5-7 किलोमीटर दूर अंदर जंगल के, हमें हमेशा ही घने पेड़ो के बीच में लकड़ी की बनी सीढिया मिलती. हर बार अलग अलग सीढ़ियां. ऐसी सीढ़ियां मानो की जैसे आपके घर में बनी होती है ऊपर जाने के लिए, बिलकुल ऐसी. लेकिन सिर्फ सीढ़ियां, ना कोई घर, ना कोई कमरा, ना और कुछ. घना जंगल, और बीच में रखी सीढ़ियां. ऐसी ऐसी जगहों पर हमें सीढ़ियां मिली जहाँ कोई आम आदमी पहुंच तक नहीं सकता था, सीढिया रखना तो दूर की बात. पहली बार जब मैंने उन सीढ़ियों को देखा तो मैं हैरान रह गया, मैंने अपने officer से पूछा तो उन्होंने शांत रहने को बोला. बोला की ये नार्मल है और घबराने की जरुरत नहीं है. जितने भी लोगो से मैंने पूछना चाहा, सबने ये एक ही बात कही. मैं उन सीढ़ियों के ऊपर जाना चाहता था उनको अच्छे से चेक करने करने के लिए की वो कहाँ से आयी हैं, लेकिन मेरी यूनिट के लोगो ने and officers ने मुझे बहुत अच्छे से समझा दिया था कभी भूल के भी उनके पास नहीं जाना है. अब तो जैसे उनकी आदत सी पड़ गयी है क्योकि इतनी बार मुझे वो सीढिया मिल चुकी हैं की अब तो उनपर ध्यान भी नहीं जाता.

आज के लिए इतना ही.

चलिए आगे शुरू करते हैं.

 

इन रहस्यमयी सीढ़िओ की बात करू तो मैंने बहुत तरह की सीढिआँ देखी हैं जंगलो में. सब सीढ़िओ की बनावट अलग अलग होती है और सबका साइज भी अलग ही होता था. कुछ सीढिया बिलकुल नयी होती थी मानो की बिलकुल अभी बनायीं गयी हो, तो कुछ बिलकुल पुरानी और जर्जर हालत में होती थी. एकबार मैंने ऐसे सीढ़ी देखी जिसको देखके लगा की वो अभी अभी किसी लोहे के दुकान से बन के आयी हो. ज्यादातर सीढिया जो की लकड़ी की बनी लगती थी, वो सीढ़ी लोहे की बनी लग रही थी और धूप में चम् चमा रही थी. आमतौर पर दूसरी सीढ़िओ से बड़ी थी और घूम कर ऊपर जा रही थी बिलकुल ऐसी जैसी बड़ी पानी की टंकीओ में सीढिआँ होती है बिलकुल ऐसी.

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सीढ़ियां बहुत बड़ी नहीं हुआ करती थी, इतनी ही होती थी जितनी आमतौर पर घरो में बनी होती है. मेरे पास कोई तस्वीर तो नहीं है उन सीढ़ियों की क्युकी उनकी फोटो लेने की सख्त मनाही थी हमें. और मैं अपनी जॉब नहीं गवाना चाहता था. भविष्य में हो सकता है मैं आपको जरूर कोई फोटो खींच के दिखाऊ, लेकिन इसका वादा नहीं कर सकता.

जब मैने अपनी जॉब शुरू ही की थी तब ट्रेनिंग के दौरान जो सबसे पहला केस मुझे मिला था वो था एक 8 साल के बच्चे को ढूंढ़ने का केस. वो बच्चा अपनी माँ से अलग हो गया था. ये एक ऐसा केस था जिसमे हमें पक्का यकीन था की बच्चा जरूर मिल जाएगा क्युकी कुत्तों को बच्चे की गंध बहुत अच्छे से मिल गयी थी और हमें बच्चे के उसी इलाके में होने के निशान भी मिल गए थे. आखिर में बच्चा मिल गया करीब 2 किलोमीटर दूर उस जगह से जहाँ से वो खोया था. बच्चे को पता ही नहीं था की वो खेलते खेलते इतनी दूर निकल गया था. हमारी ही टीम का एक साथी उसको वापिस लाया अपने साथ,अच्छा हुआ मुझे उस बच्चे को अपने साथ नहीं लाना पड़ा क्युकी मैं बच्चो को handle नहीं कर पता हूँ.

मैं और मेरी trainer जब वापिस लौट रहे थे तो मेरी ट्रेनर ने मुझसे कहा चलो आज तुमको ऐसी जगह दिखाती हूँ जहाँ हमें ज्यादातर खोये हुए लोग मिलते हैं. वो रास्ता आम रस्ते से अलग था, और करीब 2 किलोमीटर पैदल चलने के बाद हम 1 घंटे में उस जगह पहुंच गए. हम जैसे जैसे उस रास्ते में जा रहे थे मेरी ट्रेनर मुझे वो तमाम जगह दिखाती जा रही थी जहाँ उन्हे खोये हुए लोग मिले थे. तभी मुझे कुछ दूर अजीब सा कुछ दिखाई देता है. आगे बताने से पहले बता दूँ की जिस जगह हम मौजूद थे वो parking से करीब 10-12 किलोमीटर दूर थी. और साथ ही वो एक सरकारी जमीन थी, और उस पर किसी भी तरह की construction गैर कानूनी थी. अब वो चीज जो मुझे दिखती है दूर से चमकती हुई सी लगती है, और सीधी lines से बनी दिखती है. अब घने जंगल के बीच सीधी lines कैसे आ सकती है. मैं अपनी ट्रेनर को उस तरफ इशारा करता हूँ. लेकिन वो कोई जवाब नहीं देती. मैं उस चीज को ठीक से देखने के लिए आगे बढ़ता हूँ लेकिन मेरी ट्रेनर पीछे ही रहती है. और जब मैं उस चीज के करीब 20 फ़ीट पास पहुँचता हूँ तो मेरा रोग रोग खड़ा हो जाता है.

सामने एक staircase है.

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इतने घने जंगलो के बीच में जहाँ आदमी का नामोनिशान तक नहीं हो वहां सीढिया रखी हुई हैं. साफ बताऊ तो उन सीढ़ियों का वहां होना हद से ज्यादा अजीब था. वो एक नार्मल staircase था, जिसपर की लाल रंग की कालीन बिछी हुई थी और करीब 10-15 सीढिया बनी थी. बिलकुल ऐसी जैसी घरो में होती हैं. फर्क सिर्फ इतना था की वो किसी घर में नहीं थी बल्कि एक घने जंगल के बीचोबीच रखी थी. जिस लकड़ी से वो सीढिया बनी थी मैं उसकी लकड़ी को ठीक से देख सकता था.

मैं उन सीढ़ियों के सामने खड़ा था, ऐसा लग रहा था मानो दिमाग ने काम करना ही बंद कर दिया है. तभी मेरी ट्रेनर आके मेरे साथ खड़ी होती है, बिलकुल आराम से जैसे उसको कोई फर्क ही नहीं पड़ा वो देख के. मैं हैरान होकर उससे पूछता हूँ – “ये है क्या चीज ?”
“इसकी आदत डाल लो बच्चे, बहुत सामना होगा इनसे तुम्हारा” – मेरी ट्रेनर हँसते हुए मुझसे कहती है.
मैं सीढ़ियों की तरफ बढ़ता हूँ, लेकिन वो मेरा हाथ पकड़ के पीछे खींच लेती है. जोर से.
” नहीं नहीं नहीं… सोचना भी मत ” ट्रेनर मुझसे कहती है.
उसकी आवाज़ नार्मल थी लेकिन उसने मेरा हाथ जोर से पकड़ा हुआ था.

” तुम्हे ऐसी सीढ़ियां बहुत देखने को मिलेंगी. बस कभी उनके पास मत जाना, उनको छूना मत और उनके ऊपर मत जाना. बस उनको देख के अनदेखा कर देना” उसने मुझसे कहा.
मैं उससे और ज्यादा पूछना चाहता था, लेकिन जिस तरह से वो मुझे देख रही थी, मैं समझ गया था की मेरे लिए ज्यादा ना पूछना ही बेहतर है.
उसकी बात सही थी, क्युकी मेरे carrier में हर हफ्ते ही एक दो ऐसी सीढ़ियों से सामना हो ही जाता था.
कई बार तो 2-3 किलोमीटर अंदर जाने पर ही उनसे सामना हो जाता था, कई बार 25-30 किलोमीटर दूर अंदर मिलती थी. ऐसी ऐसी जगहों पर जहाँ कुछ भी नहीं था सिवाए घने जंगलो के.

ज्यादातर उनकी कंडीशन बिलकुल नयी जैसी ही होती थी. लेकिन हर बार अलग अलग साइज, अलग अलग डिज़ाइन. एक बार तो ऐसी मिली जैसे 18th century के किसी महल से निकाल कर रखी हो. कम से कम 10 फ़ीट चौड़ी और करीब 20 फ़ीट ऊपर जाती हुई. मैने कई बार कई लोगो से इनके बारे में बात करने की कोशिश की लेकिन हर बार वही जवाब जो मेरी ट्रेनर ने दिया था – ” डरो मत, ये बिलकुल नार्मल है. बहुत मिलेंगी ऐसी. बस उनके पास मत जाना कभी. ”
बाद में जब मेरे trainees मुझसे यही सवाल करते थे तो मेरा भी यही जवाब होता था. मुझे पता ही नहीं था की उनको और क्या बताऊ. उम्मीद है किसी दिन मुझे और कुछ जानने को मिलेगी उन सीढ़ियों के बारे में.

 

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जहाँ तक की खोये हुए लोगो का सवाल है, तो आप मान सकते हो की मेरे पास आने वाले लगभग आधे cases खोये हुए लोगो क़े ही हुआ करते थे.  बाकी आधे cases फंसे हुए लोगो को निकालने क़े होते थे. जैसे की कोई पहाड़ी चढ़ते हुए गिर गया और चोट लग गयी, या फिर किसी जंगली जानवर ने काट लिया हो, या फिर सांप या मधुमक्खियों ने डांक मार दिये हो, या फिर किसी ने अपने आप को जला लिया हो. आप यकीन नहीं मानेंगे ऐसा कितनी बार होता था की कोई अपने आप को ही जला ले वो भी गलती से. ऐसा करने वाले ज्यादातर जवान लड़के ही हुआ करते थे जो दारु की नशे में ऐसा कर बैठते थे.

हमारी छोटी सी टीम हुआ करती थी 7 -8 लोगो की. और हमारी टीम में ज्यादातर लोग बहुत पुराने और experienced थे जो अपने काम को बाखूबी समझते थे और करते थे. ज्यादातर cases में हमें खोये हुए शख्स का कोई न कोई सुराग मिल ही जाता था. लेकिन कुछ केस ऐसे भी होते थे जहाँ हमें कोई सुराग ही नहीं मिल पाता की खोया हुआ शख्स आखिर कहाँ गायब हुआ, ऐसे केसेस मुझे सबसे ज्यादा पेचीदा लगते थे क्युकी कोई सुराग ही नहीं मिलता था.
ऐसे ही एक केस मुझे याद है जिसने मुझे बहुत परेशान किया, क्युकी उस केस में हमें सुराग भी मिल गया था, लेकिन फिर भी हम कुछ नहीं कर पाए क्युकी उस सुराग ने केस सुलहने क़े बजाये और कई सवाल खड़े कर दिये थे. हुआ यूँ की एक आदमी जिसकी उम्र थे करीब 65 साल थी, वो पहाड़ पर चढ़ने (hiking ) क़े लिए गया था. उसकी वाइफ ने हमको कॉल किया कुछ दिन बाद उसके वापिस ना आने की रिपोर्ट लिखवाने क़े लिए. दरअसल उस आदमी को दौरे आने की बीमारी थी और वो बिना छड़ी के चल भी नहीं पाता था.  उसकी वाइफ को लगा की शायद वो अपने दवाई लेना भूल गया है और बीच में उसको कहीं दौरा पड़ गया है. इससे पहले की आप पूछे, मैं आपको बता दू की मुझे नहीं पता की वो आदमी अकेले ही क्यों गया पहाड़ पर जबकि उसको पता था की उसको ये बीमारी है, या फिर उसकी वाइफ उसके साथ क्यों नहीं गयी. मैं इस तरह के सवाल नहीं पूछा करता था क्युकी एक point क़े बाद इन सवालो का कोई मतलब नहीं रह जाता था. कोई साथ गया या नहीं गया, उससे मुझे क्या मतलब, मेरा काम खोये हुए को ढूंढ़ने का था, और मैं उसी पर फोकस करना चाहता था.  तो फिर हमने उस आदमी को ढूंढ़ने की कार्यवाही शुरू की normally जैसे हम हर एक केस में ही करते हैं. हमने 3 teams बनायीं, और उस इलाके को अच्छे से छानना शुरू किया. और थोड़ी देर बाद ही हमारे एक साथी को वो रास्ता मिल गया जिस पर वो आदमी गया था. फिर क्या था. हमने उसी रास्ते का पीछा करना शुरू कर दिया. अचानक मेरे radio -phone(walkie-talkie) पर एक साथी की call आयी और उसने हमें पीछे आने को कहा. आमतौर पर ऐसी कॉल आने का एक ही मतलब होता है की या तो खोया हुआ शख्स मिल गया है या उसकी बॉडी रिकवर की गयी है. तो हम सब उस जगह पहुंचे जहाँ हमें हमारे साथी ने बुलाया था. वहां पहुंचे तो देखा की हमारा साथी एक पेड़ के नीचे खड़ा था और ऊपर देख रहा था, उसके दोनों हाथ उसके सर पर थे. मैंने दूर से ही उसको आवाज़ लगाई तो उसने पेड़ के ऊपर हाथ करके इशारा किया. मैंने ऊपर देखा तो एक बार के लिए मुझे यकीन ही नहीं हुआ अपनी आँखों पर. पेड़ के करीब 30 फ़ीट ऊपर टहनी पर एक छड़ी (walking stick) लटकी हुई थी. उस छड़ी के ऊपर का हिस्सा जिसको की हाथ में पकड़ा जाता है वो अच्छे से टहनी में टंगा हुआ था और वो छड़ी झूल रही थी. ऐसा हो ही नहीं सकता था की उस खोये हुए शख्स ने उस छड़ी को 30 फ़ीट ऊपर उछाल कर वहां टांग दिया हो. और ना ही हमें वहां उस आदमी के आने का कोई निशान मिला. हम काफी देर वही खड़े उस झूलती हुई छड़ी को ही देखते रहे. हमने बहुत देर तक उस इलाके को छाना लेकिन उसका कोई सुराग नहीं मिला, यहाँ तक की खोजी कुत्तो (dog squad) को भी काम पर लगाया. लेकिन वो कुत्ते भी उस पेड़ के नीचे पहुंचते ही उसकी गंध खो देते थे. कुछ दिन बाद हार कर हमने वो केस बंद किया क्युकी हमें और भी केसेस पर काम करना होता था. और उससे ज्यादा हम कर भी क्या सकते थे. उसकी wife हमको महीनो तक डेली कॉल करके पूछती की उसका husband मिला क्या, और हर बार उसकी उम्मीदों का टूटना बहुत दिल तोड़ने वाला था. मुझे नहीं पता की इस एक केस ने ही मेरा दिल इतना क्यों तोडा. शायद इसलिए की उसके मिलने के चान्सेस सबसे कम थे. या फिर इसलिए के हमें इतना बड़ा clue मिलने के बाद भी हम उस शख्स को ढूंढ नहीं पाए. आखिर वो आदमी उस पेड़ तक कैसे पंहुचा ? क्या किसी ने उसका क़त्ल करके उसकी छड़ी को वहां टांग दिया था हमको challange करने के लिए ? हमने बहुत कोशिश करी उसको ढूंढ़ने की, लेकिन नहीं ढूंढ पाए. ऐसा लगा किसी ने हमको challenge किया की ढून्ढ के दिखाओ और हम उस challenge में फेल हो गए.

खोये हुए बच्चों को ढूंढ़ने का काम सबसे ज्यादा दिल तोड़ने वाला होता है. बच्चे चाहिए किसी भी हालात में खोये हो उनको ढूंढ़ना हमेशा मुश्किल ही होता है. और हमेशा, हमेशा ही जब भी किसी खोये बच्चा का केस आता है हम दुआ करते हैं की बच्चा सही सलामत मिल जाये. हमेशा तो नहीं लेकिन कुछ केसेस में dead bodies ही रिकवर होती हैं. एक बार की बात करू तो एक बार हमारे पास एक केस आया. एक lady अपने तीन बच्चो के साथ पिकनिक मनाने गयी थी एक बड़े park में, नदी किनारे. सबसे बड़े बच्चे की उम्र करीब 6 साल, दूसरे की 5 साल और तीसरे की करीब 3 साल रही होगी. तीनो बच्चे उसकी आँखों के सामने ही खेल रहे थे, और उसने बताया की उसने एक सेकंड के लिए भी बच्चो को अपनी नजरो के सामने से जाने नहीं दिया. और गौर करने वाली बात है की उसने किसी दूसरे इंसान को भी वहां आस पास नहीं देखा. मौज मस्ती करने के बाद वो लोग वापिस अपना सामान बाँध के पार्किंग एरिया में जाने लगे जहाँ उनकी कार खड़ी थी. वो नदी बहुत ज्यादा बड़ी नहीं थी, जंगलो के बीच में  कोई 3-4 किलोमीटर लम्बी रही होगी और उसके साथ का रास्ता भी बिलकुल साफ़ था, घने जगल थे,लेकिन नदी किनारे का रास्ता साफ़ था. और पार्किंग एरिया का रास्ता नदी किनारे सी ही जाता था. और ये बिलकुल impossible ही था की कोई उस रास्ते से भटक जाये. तीनो बच्चे अपनी माँ के साथ जा ही रहे थे, तीनो बच्चे आगे आगे थे और उनकी मम्मी सबसे पीछे उनपर नजर रखे हुए थी. अचानक माँ को ऐसा लगा की उसके पीछे कोई है और उसने पीछे मुड़ के देखा. इन्ही सिर्फ 3-4 सेकण्ड्स में ही 5 साल वाला बच्चा गायब हो गया. पहले माँ को लगा की शायद बच्चा सुसु करने के लिए इधर उधर हो गया है. फिर उसने दूसरे बच्चो से पूछा तो उन्होंने बताया की एक बड़ा सा डरावने मुँह का आदमी जंगल में से आया और उसका हाथ पकड़ के उसको अपने साथ ले गया. दोनों बच्चे बिलकुल डरे नहीं हुए थे. उस lady ने हमें बताया की ऐसा लग रहा था की मानो दोनों बच्चे नशे में हो. जाहिर है वो लेडी बहुत डर गयी थी और बदहवास सी होके बच्चे को ढूंढ़ने लगी. वो बच्चे का नाम लेके जोर जोर से चिल्ला रही थी, उसने बताया की एक बार तो उसको ऐसा लगा की बच्चे ने वापिस उसको आवाज़ दी हो. अब जाहिर है वो अकेली lady अकेले तो घने जंगल में नहीं जा सकती थी उसको ढूंढ़ने के लिए, उसके साथ दो बच्चेऔर भी थे. तो उसने पुलिस को कॉल किया, और पुलिस ने तुरंत हमें फ़ोन किया.

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हमारे पास केस आते ही हम जल्दी से उस जगह पहुंचे और बच्चे को ढूंढ़ना शुरू किया. हमारे साथ हमारा dog squad भी था. करीब 3-4 किलोमीटर ढूंढ़ने की बाद भी हमें बच्चा का एक निशान तक नहीं मिला.  ना ही dog squad को बच्चे की कोई गंध मिली. न पैरो के निशान, न टूटी टहनियां, ना कोई कपडा ना ही और कुछ. ऐसा कोई निशान नहीं मिला जिससे ये साबित हो सके के वो बच्चा वहां था भी. कुछ देर की लिए शक माँ पर भी गया लेकिन उसकी हालत देख के जाहिर था की वो खुद इतनी टूट गयी थी की उस पर शक करना बेकार था.  हमने volunteers की मदद से करीब एक हफ्ता उस इलाके को ढूंढा, लेकिन कुछ हाथ नहीं लगा. आखिर में हमने ढूंढ़ना बंद किया, लेकिन volunteers ने अपनी खोज जारी राखी. और एक दिन हमें रेडियो-फ़ोन पर call आयी की एक बॉडी मिली है और रिकवर करने की जरुरत है. उन्होंने जब हमें लोकेशन बताई तो हमें यकीन नहीं हुआ. बच्चे की बॉडी उसके गायब होने की जगह से करीब 20 किलोमीटर दूर मिली थी. पहले तो हमें लगा की ये किसी और बच्चे की बॉडी है. लेकिन वहां पहुंचने पर जब शिनाख्त की तो पता चला की ये वो ही बच्चा था. किसी को समझ नहीं आया की बच्चा इतनी दूर कैसे पंहुचा. वो जगह इतनी दूर थी की वहां किसी ने ढूंढा ही नहीं. वो तो बस एक volunteer ने सोचा की वो ऐसी जगह ढूंढे जहाँ कोई नहीं ढूंढ रहा है और हो सकता है बॉडी को वहां ठिकाने लगा दिया गया हो. वो एक छोटी पहाड़ी की नीचे ही ढूंढ रहा था की उसकी नजर ऊपर पड़ी किसी चीज पर पहुंची, उसने अपने binoculars से देखा तो समझ गया की ये तो उसी बच्चे की बॉडी है जिसको वो ढूंढ रहा है. Body को पहाड़ी पर बने एक छोटे से छेद में ढूंसा गया था. उसको बच्चे की shirt का color याद था इसलिए देखते ही उसको पता चल गया की ये वो ही बच्चा है. तब उसने हमको रेडियो पर कॉल किया और हम वहां पहुंचे. हमें उसकी बॉडी को निकालने में 1 घंटा लग गया था. ना सिर्फ वो बच्चा अपनी जगह से 20 किलोमीटर दूर मिला, बल्कि उसकी body ऐसी जगह पर थी जहाँ पहुंचना बहुत ही मुश्किल था. और कोई बच्चा तो वहां अकेला पहुंच ही नहीं सकता था. पहाड़ी की ढलान पर बने छोटे से छेद में उसकी बॉडी ऐसे ढूंसि हुई थी मानो किसी ने जबरदस्ती ढूंसि हुई हो. हमें हमारे पूरे gear के साथ भी उस जगह पहुंचने में बहुत मशक्कत करनी पड़ी थी. और सिर्फ इतना ही नहीं, उसकी बॉडी पर चोट का या किसी खरोंच  का एक निशान तक नहीं था. उसके पैरो में जूते भी नहीं थे, लेकिन फिर भी पैरो में जरा से भी मट्टी नहीं लगी थी. तो ऐसा भी नहीं हो सकता था की उसको कोई जंगली जानवर वहां खींच के लाया हो. और उसकी लाश को देखके ऐसा लग ही नहीं रहा था की ये बच्चा 30 दिन पहले मर चुका है. उसकी बॉडी हमको उसके खोने के 30 दिन बाद मिली थी लेकिन उसको देखके लग रहा था की लाश ज्यादा से ज्यादा एक या दो दिन पुरानी है. सारी चीजें दिमाग घुमाने वाली थी. पोस्ट मार्टम के बाद पता चला की बच्चे की मौत ठण्ड लगने से हुई थी. बच्चा ठण्ड में जम गया था. समझ नहीं आया ये सब कैसे हुआ. इतने सारे सवाल जिनका आज तक कोई जवाब नहीं मिल पाया है.

 

 

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