6 सच्ची डरावनी कहानियां

real ghost stories in hindi

कहानी-1 मैं जो कहानी आप लोगों को बताने वाली हूं, वो ज्‍यादा ड़रावनी तो नहीं है लेकिन, बिल्‍कुल सच्‍ची है। ये सब मेरी मम्‍मी के साथ हुआ था। आज से करीब 15 साल पहले की बात है। उड़ीसा के डिस्‍ट्रीक म्‍यूरभंज में मैं और मेरी फैमिली हम लोग एक नए किराए के मकान में रहने के लिए आए थे। हम से पहले उस घर में उस घर के मालिक ही रहा करते थें। लेकिन, उनके खाली कर देने के बाद वो हमें किराए पर मिल गया था। शुरू-शुरू में तो सबकुछ ठीक-ठीक रहा। सब कुछ नॉर्मल था। लेकिन, फिर करीब 6 महीनें बाद एक दिन अचानक कुछ बहुत अजीब सा हुआ। रात में घर के सब लोग सो रहे थे। अचानक करीब आधी रात को मम्‍मी की आंख अचानक खुल गई। आंख खुलते ही मम्‍मी ने महसूस किया कि लैफ्ट हाथ पर प्रैशर पड़ रहा है। जैसे की कोई उन्‍हें खींच रहा हों। उस वक्‍त मम्‍मी आधी नींद में ही थी। लेकिन, हाथ खींचे जाने के बाद मम्‍मी की नींद बिल्‍कुल टूट गई। मम्‍मी उठी तो देखा कि बैड़ के साथ उनके पास एक आदमी खड़ा था। वो देखने में कोई बूढ़ा लग रहा था। उसने सफेद रंग की धोती पहनी थी। और वो बहुत ही लंबा था। वो बस मम्‍मी को लगातार खींचे जा रहा था। जैसे की वो उनको कहीं लेकर जाना चाहता है। लेकिन, मेरी मम्‍मी बहुत हिम्‍मत वाली इंसान है। इसलिए मम्‍मी बिल्‍कुल भी नहीं ड़री। बिना ड़रे चुपचाप सोने की कोशिश की। कुछ देर के बाद मम्‍मी को अपने आप नींद आ गई। अगले दिन सुबह मम्‍मी उठी तो यहीं सोच के कि वो जरूर कोई ड़रावना सपना था। मम्‍मी ने रात की वो बात भूलानी चाही लेकिन, जब उन्‍होंने हाथ देखा उन्‍हें अपनी आंखों पर यकींन नहीं हुआ। उनके हाथ में उंगलियों के साफ-साफ निशान थें। ओर उनका वो हाथ दर्द भी कर रहा था। मम्‍मी ने पापा को वो रात वाली बात बताई तो पापा ने कहा अब वो घर बदल लेंगे।
फिर उसके करीब 8-10 दिन बाद उस घर का मालिक हमारे घर आया। वो अपने मरे हुए पिताजी के पहली बरसी के बारें में बात कर रहा था। उसके बात सुनते ही मम्‍मी ने उनसे पूछा कि उनके पिता दिखनें में कैसे थे? तो उन्‍होंने बताया की उनके पिता बहत लंबे थें और वो धोती पहना करते थें। और हमसे ये बात छुपाई गई थी कि वो इसी घर में मरे थें। उसकी बात सुनते ही मम्‍मी को सब समझ आ गया की उस रात उन्‍होंने जो कुछ देखा था, वो कोई सपना नहीं था। बल्‍कि वो तो उस घर के मालिक का पिता था, जो एक साल पहले मर चुका था। ना जाने वो खिंच कर मम्‍मी को कहां लें जाने की कोशिश कर रहा था।

कहानी-2 मेरा नाम नाग्रेन्‍द्र भाटी है और मै राजस्‍थान के चित्‍तोड़गढ़ का रहने वाला हूं। जो बात मैं आपको बताने जा रहा हूं, ये चित्‍तोड़गढ़ के फेमस किले की बात है। आपने शायद सुना होगा कि ये किला दुनिया का सबसे बड़ा किला है इसलिए यहां बहुत सारे टूरिस्‍ट भी घूमने के लिए आया करते हैं। तो आज से करीब 10-12 साल पहले एक फॉरनर आया था, किले में घूमने के लिए। वो दिवाली का दिन है। तो जो फॉरनर आया था वो पूरे दिन किले में घूमा और रात में किले के पास बने एक गेस्‍ट हॉउस में रूक गया। उस रात उसे नींद नहीं आ रही थी। इसलिए वो अकेले ही किले में वॉक के लिए निकल गया। किले में घूमते-घूमते वो बहुत अंदर तक जा चुका था। आगे पहुचा तो उसने देखा की कुछ रोशनी सी दिखाई दें रही है। उसने उस रोशनी के पास जाकर देखा तो वहां लोगों की चहल-पहल थी और मेला सा लगा हुआ था। उसने सोचा की दिवाली की रात है इसलिए कोई मेला लगा होगा। वो उस मेलें में चला गया और वहां से कुछ वुड़न हैंड़ी क्राफ्रटस भी खरीद कर ले आया और वापस अपने गेस्‍ट हॉउस में आकर सो गया।
सुबह जब उसने गेस्‍ट हॉउस के इंचार्ज से पूछा कि रात में यहां कोई मेला लगता है क्‍या किले में? तो वो इंचार्ज बोला- नहीं तो! किले में तो कोई मेला नहीं लगता। तो उस फॉरनर ने बोला कि नहीं किलें में मेला लगता है। और उसने वो हैंडी क्राफटस में दिखाए जो उसने रात में खरीदें थें। वो फॉरनर उसे उस जगह भी लें गया जहां रात में मेला लगा था। लेकिन, वहां पर जाकर देखा तो सिर्फ वीरान खंड़र ही थे, आज से 500 साल पुरानी दुकाने बनी हुई थी। जो अब खंड़र हो चुकी थी। तब उसे पता लगा कि रात में उसने जिनसे सामान लिया था वो इंसान नहीं भूत थे। शायद उन लोगों के भूत जो 500 साल पहले इस किले में रहा करते थें।
कहानी-3 मेरा नाम साहिल है। आज से दो साल पहले मेरी मौसी का लडका एक एक्‍सीड़ेन्‍ट में मारा गया था। हमारे मराठी लोगों में जब किसी की मौत होती है तो उस दिन से लेकर अगले 12 दिनों तक घर में पूजा-पाठ करवाया जाता है। इसलिए इन 12 दिनों तक मैं अपनी मौसी के घर में ही था। मौसी का घर बहुत बड़ा है। मुझें और मेरे मामा के लड़के को एक सैपरेट रूम दिया गया था। हम दोनों रात में बहुत लेट सोया करते थें। तीसरे दिन के बाद हर रोज रात 3 बजे हमें हमारे कमरे के बाहर किसी के चलने की आवाज आती थी। अगले 4-5 दिनों तक ऐसा ही चलता रहा। रोज रात को किसी के चलने की आवाज आती। नौवे दिन हमने फैसला किया की हम सुबह सबसे पूछेंगे की रात को हमारे कमरे के पास कौन चलता है।
सबसे पूछा तो सबका एक ही जवाब था। ‘मैं नहीं था’। फिर दसवे दिन हर रोज की तरह रात को चलने की आवाज आना शुरू हो गई। ठीक उसी वक्‍त मेरा भाई यानी की मेरे मामा का लड़का टॉयलेट के लिए गया हुआ था और मैं कमरे में अकेला था। मैं ड़र गया उस वक्‍त लाईट भी बंद थी। हल्‍की सी लाईट एक कोने में लगी हुई थी। मैं भागने के लिए उसी वक्‍त बिस्‍तर से उठा ही था की उस वक्‍त वो चलने की एक जगह पर आकर रूक गई। तब तो मैं ओर ज्‍यादा घबरा गया और उस वक्‍त मेरी मौसी का लड़का जो 10 दिन पहले एक्‍सीड़ेन्‍ट में मर गया था वो मेरी आंखो के सामने एक कोने में खड़ा होकर मुझे देख रहा था। मैनें देखा की उसके कपड़े बुरी तरह से फटे हुए थें और वो बुरी तरह से घायल था। ठीक वैसे ही जैसे एक्‍सीड़ेन्‍ट के बाद उसकी बॉड़ी मिली थी। मैं इतना ड़र गया था की चिल्‍लाने ही वाला था की तभी उसने हल्‍के से मेरा नाम लिया। ‘साहिल’ और मैं वहीं ड़र के मारे बेहोश गया। मैने उस बारे में मामा के लड़के को भी बताया। हम दोनों उस रूम में कभी सोने नहीं गए। बारहवे दिन सुबह मेरे मामा रो रहे थे। उन्‍होंने बताया की कल रात ठीक 3 बजे उनका दरवाजा किसी ने खटखटाया। मैं हॉल में ही सोया हुआ था और हल्‍के से सेफ्टी ड़ॉर खोला और देखा की मेरी मौसी का लड़का प्रणीत आया था। मामा ने बताया था की उसे अन्‍दर कमरे में लिया और खूब सारी बातें की। ठीक 4 बजकर 3 मिनट पर वो घर से निकला और कहने लगा की अब मैं मां से मिलने जा रहा हूं। वो चला गया और मैं फिर से सो गया। 4 बजकर 5 मिनट पर मेरी आंख फिर से खुली। 2 मिनट पहले जो हो रहा था उस पर मुझे यकीन ही नहीं हो रहा था। मेरी आंखे भी उस वक्‍त इतनी नींद में थी की जैसें की मैं 7-8 घंटें की नींद के बाद उठा हूं। वो सब सपना था या हकीकत मुझे कुछ समझ नहीं आ रहा था। दोपहर मौसी ने भी बताया की प्रणीत मेरे सपने में आया था। और मुझ से बातें करके चला गया।
कहानी-4 मेरा नाम अब्‍दुल कादिर है और मैं राजस्‍थान के उदयपुर में रहता हूं। जो बात मैं आपकों बताने जा रहा हूं ये जबकि है जब मैं 10 साल का था। उस दिन शाम को मैं अपने एक दोस्‍त के घर में था तब घड़ी में रात के 10 बज रहे थें और बातों-बातों में कब 12 बज गए पता ही नहीं चला। मेरे दोस्‍त ने कहा अब बहुत देर हो गई है तुम्‍हे घर जाना चाहिए। मैं अपने घर की तरफ निकल गया वैसे मेरा घर दूर तो नहीं था लेकिन, रात में बाहर रास्‍ता बिल्‍कुल सुनसान था। वहां से मेरे घर जाने के 2 रास्‍ते थें। एक रास्‍ता बिल्‍कुल अंधेरे वाला था, जिस पर कोई लाईट नहीं थी और दूसरा रास्‍ता वो था जिस पर बहुत सारे कुत्‍ते थें। उस गली में दिन में कुत्‍ते किसी को कुछ नहीं कहते लेकिन, रात में किसी कों वहां से जाने नहीं देते इसलिए इस ड़र से की कहीं कुत्‍ते मुझे काट ना लें, मैं बिना लाईट वाले रास्‍ते से जाने लगा। लेकिन, मुझे नहीं पता था की मेरे साथ कुछ बहुत बुरा होने वाला है। आस-पास के पेड़ के पत्‍ते हवा से उड रहे थें। जो माहौल और ज्‍यादा ड़रावाना बना रहे थें। मैं उस अधेंरे रास्‍ते से आगे जा ही रहा था की मुझे अचानक किसी औरत के चूड़ियों के खनकने की आवाज सुनाई दी। वो आवाज सुनते ही दिल में बहुत ज्‍यादा ड़र आ गया। पीछे मुड़कर देखने की हिम्‍मत नहीं थी, मैं मुश्‍किल से 10 कदम ही आगे बढ़ा था कि किसी ने मेरे कंधे पर हाथ रख दिया। उस वक्‍त तो ऐसा लगा की मानों मुझे हार्ट अटैक ही आ जाएगा। और मैं बिना कुछ सोचे-समझे वहां से भागने लगा और तब तक भागता रहा जब तक मैं अपने घर नहीं पहुंच गया। इसके बाद कई दिनों तक मैं बहुत बीमार रहा। आज भी उस रात के बारे में सोचता हूं कि अगर उस दिन मैंने पीछे मुड़कर देख लिया होता तो क्‍या होता। वो कौन था या कौन थी? क्‍या वो मुझे मारना चाहती थी। मेरी मम्‍मी मुझ से हमेशा कहती है कि अगर रात में अगर कोई पीछे से आवाज दें तो पीछे मुडकर कभी मत देखों और मैं आपसे भी यहीं कहूंगा की अगर रात में कोई आपका नाम लेकर भी अगर आपकों बुलाए तो भूल के भी मुड़कर मत देखना।
कहानी-5 मेरा नाम चिनमय है और मै गुजरात के राजकोठ में रहता हूं और ये कहानी 1960 की है। ये मेरे नाना जी के साथ हुआ था। मेरे नाना जी राजकोठ में रहा करते थें और जहां वो रहते थे वो जगह भूतों के लिए फेमस थी एक बार क्‍या हुआ कि जिस घर में वो रहते थे उनके घर के सामने ठीक एक घर था। वो घर ऐसा था की उसमें कोई नहीं रह सकता था। उस घर में बहुत अजीब-अजीब चीजे होती थी। अगर उस घर में कोई प्रगनेन्‍ट औरत आती थी तो रात को वो जिस चारपाई पर सोती थी, उस चारपाई को रात को कोई हवा में उठा लेता था।
मेरे नाना जी के रूम के ठीक सामने उस घर के एक कमरे की एक खिड़की दिखाई देती थी। रात में जब भी मेरे नाना जी उस रूम में सोते तो वो खिड़की सामने ही दिखाई देती थी। जब मेरे नाना जी वहां सोते थे तो सामने वाली खिड़की में एक बच्‍चे का सिर दिखता था। उस बच्‍चे का सिर्फ सर ही दिखाई देता था और कुछ नहीं। कई बार उस बच्‍चे का सर उस खिड़की से निकल मेरे नाना जी की चारपाई के नीचे आकर चारपाई को ऊपर उठा लेता था और कुछ देर बाद जब वो थक जाता तो वापस चला जाता उसी खिड़की में। उस घर में जब भी काई परिवार रहने जाता तो उस परिवार में किसी ना किसी की मौत जरूर हो जाती थी। हमारे यहां उसे रंड़मुंडिया कहते हैं।
कहानी-6 मेरा नाम सचिन है और मैं राजस्‍थान का रहने वाला हूं। जो कहानी मैं आपकों बताने जा रहा हूं वो मेरे साथ हुई एक सच्‍ची कहानी है जब मैं पहली बार बुरी तरह ड़र गया था। उस दिन हम एक ट्रिप के लिए महाराष्‍ट्र से राजस्‍थान की ओर जा रहे थें। हम सब कार में थे और शार्टकट लेने के चक्‍कर में हम एक दूसरी जंगली रास्‍तें से जाने लगें। हम उस रास्‍ते से जा ही रहे थे की हमारी कार का इंजन खराब हो गया। उस जगह से थोड़ी ही दूर एक बंगला दिखाई दें रहा था और दूर से देखने पर वो बहुत पुराना सा लग रहा था। हम वहां खड़ें ही थी और एक आदमी वहां आया और बोला की क्‍या आपकों कोई रूम किराये पर चाहिए। हम उस जगह फस चुके थे। हमारी हालत बहुत खराब थी और आसपास कोई घर नजर भी नहीं आ रहा था। इसलिए पापा ने उसको रूम के लिए हां कर दिया। फिर जैसे ही हम उस बंगले के पास पहुंचे तो देखा की बंगले के आगे सड़क के पास एक पुराना कब्रिस्‍तान था। हम बस यहीं बात कर रहे थे की किसी तरह बस आज की रात गुजर जाएं और कल सुबह ही हम गाड़ी ठीक करवा कर यहां से चले जाएंगे। कमरे में पहुंच कर हम सब सो गए। रात में सब लोग सो ही रहे थे की रात में अचानक मेंरी आंख खुल गई और पता नहीं क्‍यों मेरा बाहर जाने का मन करने लगा। मैं कमरे से निकलकर जैसे ही बाहर हॉल में पहुंचा तो देखा की मेरे पापा हॉल में बैठे टीवी देख रहे हैं। उन्‍हें इतनी देर तक टीवी देखने की आदत नहीं थी। लेकिन, मैंने ज्‍यादा ध्‍यान नहीं दिया। और बाहर टहलने के लिए चला गया। वो ईलाका ऐसा था की उस बंगले के चारो तरफ जंगल ही जंगल थें। बाहर पहुंचा तो वहां जाते ही मुझे किसी के चलने की आवाज सुनाई देने लगी। कुत्‍ते और सियारों की जोर-जोर से भोकने और रोने की आवाजे आ रही थी। मैं वहां टहल ही रहा था की मुझे लगा की मेरे पीछे कोई खड़ा है। और जैसे ही मैंने पलट कर देखा तो 2 औरते मेरे पीछे खड़ी है और वो दोनों मेरी ही तरफ देख रही थी। उनकी आंखे बिल्‍कुल चमकदार थी उनकों देखते ही मैं बेहोश हो गया। सुबह जब मेरी आंख खुली थी तो देखा मैं अपने घर वालों के साथ था और हम सब लोग उस बंगले से दूर आ चुके थें। मैंने अपने घरवालों को भी सबकुछ बताया लेकिन, किसी ने मेरी बात पर यकीन नहीं किया। आज भी वो पल याद करके मैं ड़र जाता हूं।

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